भोपाल. 'हाय रे शर्माइन का सोफा'... यह ऐड इन दिनों दिलो-दिमाग पर छाया है और देखने वालों को चाहे-अनचाहे उन चीजों की याद दिला ही दे रहा है, जो उनके घरों में पीढ़ियों से हैं। पुरानी चीजेंं, उनसे जुड़ी यादें और कहानियां। शहर के कुछ ऐसे ही परिवारों से हमने जाना कि ऐसी कौन सी चीजें उनके पास हैं जिनकी उम्र 100 साल से ज्यादा है और इनसे क्या यादें जुड़ी हैं। इस ऐड के जनक पीयूष पाण्डेय और प्रसून पाण्डेय ने भास्कर से खास बातचीत में बताई कहानी...
उस सोफे की कहानी जो ऐड की प्रेरणा बनी
इस ऐड काे तैयार किया है ओगिल्वी इंडिया के चीफ क्रिएटिव ऑफिसर वर्ल्ड पीयूष पाण्डेय, उनके भाई काॅरकाॅइस फिल्म के डायरेक्टर प्रसून पाण्डेय और पिडिलाइट ने। पीयूष कहते हैं- आइडिया प्रसून काे आया था। हम इस ऐड में 60 सालों के कल्चरल चेंज को दिखाना चाहते थे, कैसे इन 60 सालों में किसी ने समय को बदलते हुए देखा है। हम अक्सर लोक धुनों पर काम करते हैं और शायद यही वजह है कि यह धुनें जु़बान पर चढ़ जाती हैं।
आइडिया कैसे आया, इसकी कहानी प्रसून ने सुनाई- फेविकोल के 60 साल पर हम एक कहानी शूट करने जा रहे थे, तो किसी ने कहा इसमें '60 साल' जैसा कुछ आना चाहिए। मैंने कहा, मेरे पास एक कहानी तो है, मगर थोड़ी लंबी है। सबने कहा, थोड़ा सुनाओ.., सोफे वाली कहानी सुनाई, तो तालियां बजने लगीं। अमूमन ऐड बनाने वाले कहते हैं, छोटे से छोटा ऐड बनाओ, इस कहानी को सुन सबने कहा, लंबाई भूल जाओ, अब ये बनानी ही पड़ेगी।
जिस सोफे से यह कहानी आई, वो असल में हमारे घर का ही है। अभी भी हमारे जयपुर वाले घर में वह 2-सीटर सोफा रखा है। हमारी मां ने बताया था- 1946 में एक ब्रिटिश फैमिली लखनऊ से अपने देश वापस जा रही थी। पिता जी ने उनसे खरीद लिया था। टू-सीटर सोफे के साथ दो सिंगल सीटर, एक सेंटर टेबल, 2 साइड स्टूल.. सब कुछ 42 रुपए में।
सोफे में काम तो होता ही रहता है- कभी कवर बदलवाना पड़ता है, कभी चूहे कुतर जाते हैं, तो कभी धूप की साइड वाला हिस्सा फेड हो जाता है। ऐसे ही एक बार जब आंगन में इस सोफे का कपड़ा बदला जा रहा था, तो मुझे उसमें पुराने फंसे हुए कुछ रेशे दिखे, जिनको देखकर याद आया कि, अरे हां... हमारे बचपन में तो यह नारंगी रंग का होता था, बाद में ग्रीन करवाया गया। बहन की शादी में इस पर ब्राउन कपड़ा चढ़ा और पीयूष सेंट स्टीफन पढ़ने गए तो इस पर जकार्ट का कपड़ा भी लगा था। मुझे लगा, यह सोफा तो बिलकुल भीष्म पितामह बन गया है। इसने हमें छोटी सी उम्र में देखा है और आज भी देख रहा है, जब अलग-अलग पड़ावों से गुजरते हुए हम बच्चों की शादियां कर रहे हैं।
इस कहानी में बदलते वक्त को दिखाया है- शर्माइन शादी करके सोफा लाई हैं, लेकिन सोफे पर उनके ससुर जी ही बैठते हैं। वो तो सिर्फ मसाला कूटती हैं। बहन की शादी में शर्माइन ने अपना सोफा नया करवाकर दे दिया। समय बदला और ओहदा नाम से बड़ा हुआ तो कलेक्ट्राइन का सोफा कहलाया। अब वह पति के साथ उसी सोफे पर बराबरी से बैठी हैं, और मोहल्ले के एक टीवी को सब एन्जॉय कर रहे हैं। अंत में, बेटी इंटरकास्ट मैरिज करती है, पति चाय बनाकर लाता है।

प्रसून (बाएं) कहते हैं- सोफे ने यह समय भी देखा है और अब वह समय भी देख रहा है, जब कोई ब्याह कराए या ना कराए... यानी लिव-इन में भी रह रहे हैं, और सब खुश हैं। जीवन के उतार-चढ़ावों को दिखाने के लिए ही बाढ़ भी दिखाई, उस आपदा में भी कुछ चीजें साथ नहीं छोड़तीं।